मेहमान का पन्नाः जनता से छीनी जाती दिल्ली

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नारायण मूर्ति/ मेहमान का पन्ना

दिल्ली की पहचान के रूप में स्थापित हरे-भरे पेड़ों की कतारों और खुले मैदानों से भरे सेंट्रल विस्टा के नए सिरे से विकास की बात को जायज ठहराने के लिए सरकार ने चाहे जो अतिरिक्त प्रयास किए हों, उसका कोई भी स्पष्टीकरण अचानक सामने आई इस बात की अपारदर्शिता को कम नहीं कर सका है. इस प्रस्ताव का विरोध कर सैकड़ों वास्तुकार, नगर नियोजक, पर्यावरणवादी, विरासतों के संरक्षण में लगे लोग और नागरिक लगातार दबाव डाल रहे हैं कि प्रस्ताव पर दुबारा सोचा जाए. इस मामले में विरोध समाप्त नहीं हुआ है. हमें नहीं पता कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल को सही सलाह मिली है या नहीं. ऐसे किसी भी प्रस्ताव के अपने गंभीर परिणाम होते हैं और व्यापक विचार-विमर्श से निर्णय लिए बिना इन्हें लागू नहीं किया जाना चाहिए. प्रक्रियाओं और संस्थाओं के प्रति सम्मान ही वह पहली बात है जो हमें तानाशाहियों और राजतंत्रीय व्यवस्थाओं से अलग करती है.

सरकारी कार्यालयों का स्थान पहले से बड़ा करने के लिए केंद्र सरकार को जनता और मनोरंजनार्थ उपयोगों के लिए निर्धारित भूमि पर कब्जा करना होगा. दिल्ली दुनिया की उन कुछ राजधानियों में से है, जहां हरा-भरा केंद्रीय हिस्सा पूरी तरह से जनता के लिए है. यहां तक कि औपनिवेशिक शासन व्यवस्था भी स्वीकारती थी कि शासितों की मौजूदगी के बिना शासक कुछ नहीं हैं और इसी सिद्धांत को हमारे संस्थापक पूर्वजों ने भी स्वीकार किया था. राजपथ और जनपथ के रूप में सड़कों के सोद्देश्य बदले गए नाम सरकार और लोगों के मिलन बिंदुओं की ओर संकेत करते हैं.

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