और रास्ता भी क्या बचा था

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मंगलवार की सुबह सुप्रीम कोर्ट से झटका और फिर उप-मुख्यमंत्री के पद से अजित पवार के इस्तीफे के बाद यह लगभग तय हो गया था कि महाराष्ट्र की भाजपा सरकार विश्वास मत की ओर अब शायद ही बढे़गी। दिन ढलते-ढलते मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंप भी दिया। भाजपा ने यह फैसला सोच-समझकर लिया। यह स्पष्ट हो गया था कि नई विधानसभा का विश्वास उन्हें हासिल नहीं है, इसलिए विश्वास मत में उतरकर वह अपनी और अधिक फजीहत नहीं करवाना चाहती थी।
अब सवाल यह है कि इस सूबे में क्या होगा और शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस का नया गठबंधन कितनी स्थिर सरकार दे सकेगा? यह सही है कि विचारधारा और सियासत के नजरिए से एनसीपी, शिव सेना और कांग्रेस में काफी सारे मतभेद रहे हैं। फिर भी, इस वक्त इन तीनों दलों के गठबंधन में एकता दिख रही है, और इसका श्रेय खुद भाजपा को जाता है।
दरअसल, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों के आने के बाद से ही ये तीनों दल आपसी विवाद सुलझाने में जरूर जुटे रहे, लेकिन उनमें सहमति नहीं बन पा रही थी। मगर शुक्रवार-शनिवार की आधी रात की राजनीति ने उन्हें अचानक एक कर दिया। पहले, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी शिव सेना को समर्थन देने को लेकर उलझन में थीं और राज्य सरकार में शामिल होने का स्थानीय इकाई का दबाव भी झेल रही थीं, लेकिन उनकी मुश्किलें एक झटके में खत्म हो गईं। तीनों दलों में इतना जबर्दस्त एकता हो गई कि किसी पार्टी का एक भी विधायक डिग नहीं सका। यहां तक कि एनसीपी के बागी विधायक भी (शरद पवार खुद ऐसे विधायकों की संख्या 10-11 बता रहे थे) वापस अपने खेमे में लौट आए। सरकार बनाने की भारतीय जनता पार्टी की जल्दबाजी ने विपक्षी दलों के तमाम विधायकों में यह उम्मीद जगाई कि वे भी सरकार बना सकते हैं, और जब सरकार बनाने का आभास होता है, तो विधायक टूटता नहीं, अपने दल के प्रति और मजबूत हो जाता है।
नई सरकार के टिकाऊ होने की संभावना इसलिए भी कही जा रही है, क्योंकि शरद पवार और शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे में आपसी समझ इन दिनों गहरी हुई है। यह समझ चुनावी नतीजों के बाद नहीं बनी है। एनसीपी सुप्रीमो का ठाकरे परिवार से पहले से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन चुनाव के दौरान शरद पवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से मिली नोटिस ‘टर्निंग प्वॉइंट’ साबित हुई। इस नोटिस के बाद एनसीपी सुप्रीमो भाजपा पर हमलावर हुए, और मराठा अभिमान, दिल्ली बनाम मुंबई की राजनीति, छत्रपति शिवाजी की तरह लड़ने आदि का आह्वान करने लगे। इसकी वजह से वहां का चुनाव दिलचस्प बन गया। मतदाताओं को भी एक नया विकल्प दिखने लगा। वहां बेशक सत्ता-विरोधी रुझान नहीं थे, मगर लोग भाजपा-शिव सेना गठबंधन सरकार से बहुत खुश भी नहीं थे। नतीजतन, मतदाता एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में भी गोलबंद हुए। उधर, शिव सेना और भाजपा गठबंधन के मतभेद नतीजे के दिन ही जाहिर हो गए, जब देवेंद्र फडणवीस की संयुक्त प्रेस-वार्ता की मांग को शिव सेना प्रमुख ने खारिज कर दिया। इधर मराठा नेता के तौर पर शरद पवार हावी होने लगे थे। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल का पूरा इस्तेमाल किया और एक हारी हुई बाजी अपने नाम कर ली।
इस पूरे सियासी घटनाक्रम से सिर्फ देवेंद्र फडणवीस को झटका नहीं लगा है, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का अगुवा दल होने के नाते कुछ सवाल भाजपा को भी परेशान करेंगे। जेपी नड्डा को क्या अब पार्टी का पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाया जाएगा? पार्टी के स्तर पर अमित शाह कितने सक्रिय रह पाएंगे? अन्य राज्यों में साथी दल कितना दबाव बनाएंगे? क्या बिहार में ठोस गठबंधन आकार ले सकेगा? ये ऐसे सवाल हैं, जिनसे भारतीय जनता पार्टी को काफी गंभीरता से जूझना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र के इस सियासी नाटक में शरद पवार विपक्ष के राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे हैं। वह विपक्ष को एकजुट करने के लिए क्या-क्या करेंगे, इस पर भी नजर बनी रहेगी।
महाराष्ट्र की नई राजनीति से कांग्रेस का एक अलग चेहरा उभरकर सामने आया है। उसने दिखाया है कि राज्यों में वह ‘छोटे भाई’ की भूमिका ओढ़ने को तैयार है। अच्छी बात यह है कि वह अब तमाम साथी दलों को एक धरातल पर देखने लगी है। फिर क्षेत्रीय दलों को नेतृत्व सौंपने पर भी उसने हामी भर दी है। वह इस सवाल पर भी अब स्पष्ट रुख अपनाने लगी है कि उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी कौन है? अपने मुख्य विपक्षी दल को मात देने के लिए वह अन्य प्रतिद्वंद्वी दलों के साथ समझौता करने से भी अब हिचक नहीं रही।
रही बात शिव सेना की, तो उसके लिए उग्र हिंदुत्व की राजनीति अब आसान नहीं होगी। बहुत मुमकिन है कि वह उदार हिंदुत्व की वकालत करे, जिसमें समग्रता की बात हो और जो किसी के खिलाफ न हो। रोजगार, कृषि संकट, अन्नदाताओं की मुश्किलों से जुड़े सवाल वह सबसे पहले हल करना चाहेगी। उसके राष्ट्रवाद में हो सकता है कि अब मराठा मानुस को अहमियत दी जाए और रोजगार में स्थानीय लोगों को आरक्षण मिले, लेकिन यह सब दूसरे समुदायों का अहित करके नहीं होगा। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी इन्हीं सब एजेंडे पर आगे बढ़ सकती है। हालांकि यह तय है कि मुख्यमंत्री का चेहरा कोई भी हो, सरकार तो शरद पवार ही चलाएंगे।
महाराष्ट्र में अब आने वाले स्थानीय निकाय के चुनाव काफी दिलचस्प हो गए हैं। कई ऐसे इलाके हैं, जहां एनसीपी और शिव सेना एक-दूसरे के खिलाफ थी। इसीलिए स्थानीय निकायों में यह गठबंधन क्या रूप लेगा, यह देखने वाली बात होगी। हालांकि एनसीपी और शिव सेना एक साथ मैदान में उतरती है, तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जाहिर है, अब भाजपा को जमीन पर बहुत ज्यादा पसीना बहाना पड़ सकता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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